कई हजार वर्ष पहले, दक्ष नामक एक राजा थे जो ब्रह्मा के मनसपुत्र थे। दक्ष राजा की रानी का नाम सती था, जो महादेव (भगवान शिव) की पत्नी थीं। सती ने शिव के प्रति अत्यंत भक्ति और प्रेम रखा था। वे भगवान शिव को अपने पति के रूप में बहुत आदर करती थीं और उनके साथ एकांत में ध्यान धारण किया करती थीं।
एक दिन, दक्ष राजा ने एक बड़ा यज्ञ का आयोजन किया और समस्त देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने महादेव को नहीं बुलाया। इसके बाद यज्ञ के समय, सती ने अपने पिता के यज्ञ में भगवान शिव के अनभिज्ञ आमंत्रण को लेकर उनसे विवाद किया। उन्होंने अपने पति का अपमान नहीं सहन किया और यज्ञ के कुंड से कुछ अशुद्धि के कारण सती ने अपने शरीर को भस्म कर दिया।
इस घटना से भयभीत होकर, महादेव भयंकर विक्षेप में पड़ गए और उन्होंने अपने जतिन को लेकर विश्वविराट् तांडव नृत्य किया। भगवान शिव के नृत्य के वज्री टहनियां बज रही थीं, और उनके तांडव नृत्य से विश्व के सभी दिशाएं हिल रही थीं। इससे संत्रासित हुए देवता ब्रह्मा, विष्णु, और अन्य देवी-देवताएं भगवान शिव के आग्रह पर रुकवाने का प्रयास करते रहे, लेकिन वे विक्षेपथ्य हुए रहे।
देवताओं ने अनंत नाग (शेषनाग) से उनके पास जाकर उन्हें शांत करने का विचार किया। अनंत नाग भगवान शिव के जटाओं में स्थित थे और उनकी अविराम भजन से प्रसन्न हुए भगवान शिव ने तांडव नृत्य बंद कर दिया।
इस घटना के बाद, भगवान शिव ने सती के प्राण ज्ञात कर उन्हें पुनर्जन्म के लिए वापस जन्म लेने का संकल्प किया। सती ने अपने अगले जन्म में पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया और फिर से भगवान शिव की पत्नी बनीं।
इस प्रकार, नाग पंचमी की कथा भगवान शिव और पार्वती के प्रेम एवं परिवर्तन की एक रोमांचक कहानी है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। नाग पंचमी पर सर्पों की पूजा और भगवान शिव-पार्वती की आराधना की जाती है, जिससे सर्पों की कृपा मिले और सभी प्रकार के सर्पदोष से रक्षा हो।
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